बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष डॉ दिलीप जायसवाल के दावे से अंदर तक हिली सीमांचल की चुनावी राजनीति
सीमांचल की राजनीति में इस बार बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिलीप जायसवाल के दावे ने हलचल मचा दी है। पूर्णिया की सरजमीं से उन्होंने कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव में सीमांचल की अधिकांश सीटें एनडीए के खाते में जाएंगी और बिहार में “मोदी की गारंटी” तथा “नीतीश के विकास” पर जनता फिर भरोसा जताएगी। यह दावा उस सीमांचल के संदर्भ में बड़ा माना जा रहा है, जिसने 2020 में एनडीए को लगभग पूरी तरह बाहर कर दिया था। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, एनडीए की रणनीति इस बार बेहद सुनियोजित है — कई पूर्व एनडीए नेताओं को महागठबंधन (राजद-कांग्रेस) से टिकट दिलवाकर चुनाव मैदान में उतारा गया है। अनुमान है कि जीत के बाद ऐसे उम्मीदवार पुनः एनडीए में लौट आएंगे, जिससे एनडीए अप्रत्यक्ष रूप से सीटों पर कब्जा कर सकेगा। यह “सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे” वाली रणनीति सीमांचल की चुनावी दिशा बदल सकती है। डॉ. जायसवाल ने महागठबंधन से टिकट लेकर चुनाव लड़ने वाले नेताओं पर भी तीखा प्रहार करते हुए कहा कि ऐसे अवसरवादी नेता जनता की नज़रों में बेनकाब हो चुके हैं। उनके इस बयान से सीमांचल का पूरा चुनावी माहौल गरम है, और अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह रणनीति एनडीए को सीमांचल में अप्रत्याशित बढ़त दिला पाएगी।
सीमांचल (अशोक कुमार)
इससे ज्यादा अजीबोगरीब इत्तेफाक की बात क्या हो सकती है कि जिस सीमांचल ने 2020 के विधान सभा चुनाव के दौरान अपने एन डी ए विरोधी मिजाज़ के कारण एन डी ए को किशनगंज जैसे चर्चित जिले ही नहीं वल्कि किशनगंज संसदीय क्षेत्र के सभी छह विधान सभा क्षेत्रों को एन डी ए मुक्त बना दिया था और उसके साथ साथ सीमांचल के कई अन्य विधान सभा क्षेत्र की सीटों पर भी एन डी ए के उम्मीदवारों का पसीना छुड़ा दिया था , उस सीमांचल के केन्द्र पूर्णिया जिला मुख्यालय की सरजमीं से एन डी ए गठबंधन के एक घटक भाजपा के नेतृत्वकर्ता भाजपा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष डॉ दिलीप जायसवाल द्वारा दावा कर दिया गया है कि इस बार के विधान सभा चुनाव के दौरान सीमावर्ती क्षेत्र सीमांचल की विधान सभा क्षेत्रों की सीटों में से सबसे ज्यादा सीटें एनडीए गठबंधन ही जीतेगी और बिहार में मोदी जी की गारंटी और नीतीश के विकास पर विश्वास करने वाली जनता पूरी ताकत के साथ एन डी ए की सरकार को बिहार में फिर से स्थापित करेगी।
सीमांचल के बड़े क्षेत्र पूर्णिया किशनगंज और अररिया जैसे जिलों के स्थानीय प्राधिकार निकाय पंचायत वाले त्रिस्तरीय विधान परिषद क्षेत्र से लगातार तीन बार से विधान परिषद का चुनाव 80 -- 80 प्रतिशत रिकॉर्ड वोटों से जीतने वाले किशनगंज वासी विधान पार्षद सह बिहार सरकार के पूर्व मंत्री सह बिहार प्रदेश भाजपा के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष डॉ दिलीप जायसवाल के इस तरह के दावे ने संपूर्ण सीमांचल की चुनावी राजनीति को पूरी गहराई तक हिला दिया है और इसे बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष द्वारा सीमांचल क्षेत्र की परंपरागत मिजाज़ को चुनावी वक्त के दौरान दिया गया चैलेंज माना जाने लगा है।
जिस कारण आशंका जताए जा रहे हैं कि अबकी बार के विधान सभा चुनाव के मद्देनजर दिलीप जायसवाल के द्वारा दिए गए यह चैलेंज कहीं सार्थक न साबित हो जायें ।
बिहार राज्य में ही नहीं वल्कि राष्ट्रीय राजनीति के मानचित्र में सबसे बड़े अति संवेदनशील मुस्लिम बहुल क्षेत्र के रूप में ख्यात सीमांचल पूर्णिया प्रमंडल के सभी चौबीसों विधान सभा क्षेत्रों की सीटों को इस बार हर हाल में जीत लेने का मनसूबा इंडी महागठबंधन द्वारा पिछले संसदीय चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद से ही तब पाला जाने लगा था जब सीमांचल पूर्णिया प्रमंडल की एकमात्र अररिया संसदीय क्षेत्र की सीट को छोड़ कर शेष तीन संसदीय क्षेत्रों पूर्णिया , किशनगंज , कटिहार को पिछले संसदीय चुनाव में इंडी महागठबंधन ने जीत लिया था।
उसके आधार पर ही सीमांचल की सभी चौबीसों सीटों को इस बार के विधान सभा चुनाव में जीत लेने का लक्ष्य इंडी गठबंधन द्वारा तय किया गया था।
लेकिन , इस बार के विधान सभा चुनाव के दौरान राजनीति की ऐसी चाल एन डी ए गठबंधन वाली भाजपा और जदयू ने चल दी है कि इंडी महागठबंधन के जीत के लक्ष्य के विपरीत उल्टा एन डी ए गठबंधन के नेताओं द्वारा ही सीमांचल की अधिकाधिक सीटें जीत लेने के दंभ भरे जाने लगे हैं और इस बात पर सीमांचल ही नहीं वल्कि सीमांचल की चुनावी राजनीति की सहायक रहने वाली सीमांचल के अगल बगल के जिलों में भी आश्चर्य व्यक्त किए जाने लगे हैं।
जानकारों की मानें तो इस बार के विधान सभा चुनाव के दौरान सीमांचल की अधिकाधिक सीटें जीत लेने का दंभ भाजपाइयों द्वारा इसलिए भरा जाने लगा है , क्योंकि , इस बार बड़ी ही सुनियोजित तरीके से सीमांचल की महत्वपूर्ण विधान सभा क्षेत्र की सीटों पर कांग्रेस राजद के चुनावी टिकटों पर एन डी ए गठबंधन वाले नेताओं को ही सुनियोजित तरीके से इस्तीफा दिलाकर बतौर महागठबंधन उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतार दिया गया है।
समझ यही रही कि ऐसे उम्मीदवारों की अगर जीत हो जाएगी तो वैसे विधायक सीधे एन डी ए के कुनबे में जा समाएंगे , अर्थात , इस क्रम में सांप भी मरेगी और लाठी भी नहीं टूटेगी वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी।
सीमांचल के पुराने अनुभवी राजनीतिज्ञों के अनुसार , इस चुनावी योजना के अंतर्गत एन डी ए ने पहले कांग्रेस और राजद के वैसे नेताओं को सुनियोजित तरीके से अपने विश्वास में लिया जिनके हाथों सीमांचल की विधान सभा क्षेत्र की सीटों के लिए चुनावी टिकटें वितरित करने के अधिकार थे।
इस क्रम में पहले कई एन डी ए नेताओं का सुनियोजित इस्तीफा एन डी ए से कराया गया और उसके बाद वैसे ही नेताओं के द्वारा राजद कांग्रेस की टिकट की जबरदस्त दावेदारी भी इतनी ताकतों के साथ पेश कराया गया कि कुछ महत्वपूर्ण सीटों के सिटिंग राजद विधायक अथवा सिटिंग कांग्रेस विधायक चुनाव से बाहर करा कर हाशिए पर धकेल दिए गए।खूब थुक्कम फजीहतें आपस में हुए और बड़ी चालाकी पूर्वक चुनावी टिकटों की खरीद फरोख्त की चर्चाओं के बीच ही इस्तीफा देकर आए पूर्व एन डी ए नेताओं में ही राजद और कांग्रेस के चुनावी टिकट वितरित कर दिए गए।
इस मामले पर मचे हल्ला हसरातों को शांत करने के लिए उस दौरान बिहार प्रभारी के रूप में आसीन रहे कृष्णा अल्लावरू जैसे कांग्रेस नेता जमकर बदनाम किए गए अर्थात सारा ठिकड़ा उन्हीं के मत्थे फोड़ दिया गया और उन्हें पार्टी हाइकमान द्वारा सस्पेंड और पदमुक्त करवा कर अल्लावरू से दबाव डालकर टिकट का घोटाला कराने वाले बिहार कांग्रेस के शेष तीन वैसे नेताओं पर पर्दा डालने का सुनियोजित प्रयास किया गया लेकिन , इसके बाबजूद अल्लाबरू सहित पर्दानशी किए गए उक्त तीनों नेताओं को टिकट से वंचित किए गए सिटिंग विधायकों द्वारा दिलखोलकर गरियाया गया।लिहाजा , एक ओर बिहार विधान सभा चुनाव की सरगर्मियां बढ़ती गई तो दूसरी ओर से इन कांडों के जिम्मेवारों की चर्चाएं भी गौण होती चली गई।
लेकिन , अनुभवी राजनीतिज्ञों का दावा है कि जिन जिन सीटों पर जीत का दावा करते हुए आश्चर्यजनक चुनावी इस सीमांचल में खेल किए गए हैं.........,उन सभी सीटों के राजद कांग्रेस प्रत्याशियों की पराजय के बाद से उपरोक्त टिकट घोटाले का मामला बुरी तरह से उजागर होते हुए बिहार कांग्रेस से बिहार राजद तक की राजनीति में भारी विस्फोट पैदा हो जा सकता है। जिसके साथ साथ सुनियोजित चुनावी राजनीति की साजिशों का भी खुलासा हो जा सकता है।
और सीमांचल की कथित परंपरागत मिजाज़ का भद्द भी पीट जा सकता है।
सीमांचल क्षेत्र के जन प्रतिनिधि होने के नाते पूर्णिया की सरजमीं से स्वयं अपने मुखारबिंद से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए ऐसा संकेत डॉ दिलीप जायसवाल ने दे दिया है।
हालांकि , इस मद में एक राजनीति यह भी चर्चा में है कि धमदाहा की सीट पर चुनाव लड़ रही बिहार सरकार की निवर्तमान मंत्री सह जदयू प्रत्याशी लेसी सिंह से राजद की टिकट पर चुनाव लड़ रहे पूर्णिया के पूर्व सांसद संतोष कुशवाहा पर भी डॉ दिलीप जायसवाल द्वारा संकेतों में ही राजनीतिक निशाना साधा गया और इस क्रम में उन्होंने कह दिया है कि जिनका अपना कभी कोई विचार धारा नहीं रहा है वो विधायक बनने की बेचैनी में सर्वप्रथम अपनी उस पार्टी तक के प्रति वफादार नहीं रह सके हैं जिस पार्टी ने उन्हें कहां से कहां तक पहुंचा दिया। उन्होंने यह भी कह दिया कि वैसे नेताओं को जनता भलीभांति पहचान रही है और समझ भी रही है , कि , वैसा इंसान जनता और मतदाता का अपना कभी नहीं हो सकता है।
इस क्रम में पूर्णिया सदर विधानसभा क्षेत्र से लेकर कसबा विधानसभा क्षेत्र तक में विधायक बनने की ख्वाहिश से महागठबंधन की टिकट पर चुनाव मैदान में कूदने वाले प्रत्याशियों को आड़े हाथों लेते हुए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ दिलीप जायसवाल ने कहा कि ये नेतागण भाजपा जदयू के एहसानों को भूलकर विधायक बनने की ललक में जदयू भाजपा की परिक्रमा से विमुख होकर पहले जिस तिस नेताओं के दरबारी बने और बाद में किसी तरह से टिकट की जुगाड़ करके चुनाव मैदान में आ खड़े हुए हैं तो जनता उनकी नीयत और नीति से अवगत है और उन्हें किसी कीमत पर प्रश्रय देने को तैयार नहीं है।



