सीमांचल में एनडीए पर अंदरूनी ग्रहण — जदयू-भाजपा के मतभेद से कमजोर हुआ चुनावी जोश

सीमांचल के विधान सभा चुनाव में इस बार एनडीए गठबंधन के भीतर गहराते अंदरूनी मतभेद और निष्क्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। भाजपा, जदयू और एलजेपी (आर) के उम्मीदवार तो अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं, परंतु आपसी समन्वय और सहयोग का अभाव चुनावी रणनीति को कमजोर कर रहा है। कई स्थानों पर जदयू की उदासीनता तो कहीं भाजपा की निष्क्रियता देखी जा रही है। एलजेपी (आर) के कुछ उम्मीदवार गठबंधन दलों के नेताओं से दूरी बनाकर व्यक्तिगत प्रभाव में चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे एनडीए का संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। पूर्णिया, धमदाहा, किशनगंज और ठाकुरगंज जैसी सीटों पर एनडीए की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, फिर भी जीत को लेकर नेताओं में आत्मविश्वास की कमी दिखाई दे रही है। खासकर जदयू के वरिष्ठ रणनीतिकारों और नेताओं की अनुपस्थिति ने चुनावी जोश को ठंडा कर दिया है। पूर्व सांसद संतोष कुशवाहा के इस्तीफे के बाद जदयू की स्थानीय सक्रियता लगभग ठहर-सी गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कुछ आंतरिक नेताओं द्वारा उम्मीदवारों को गुमराह किए जाने से एनडीए का चुनावी तंत्र अस्त-व्यस्त हो गया है। ऐसे में अगर इन मनमुटावों को दूर नहीं किया गया, तो सीमांचल में एनडीए के लिए जीत का मार्ग कठिन हो सकता है।

सीमांचल में एनडीए पर अंदरूनी ग्रहण — जदयू-भाजपा के मतभेद से कमजोर हुआ चुनावी जोश
  • “रणनीति बिना जोश, संगठन बिना समर्पण — सीमांचल में एनडीए की मुश्किलें बढ़ीं।”
  • “जोश नहीं, होश भी खो रहा है एनडीए — चुनाव से पहले ही सुस्ती का ग्रहण।”
  • “एकता की कमी, उत्साह की ठंडी लहर — सीमांचल का एनडीए असमंजस में।

सीमांचल  (अशोक/विशाल)

सीमांचल पूर्णिया प्रमंडल की जनता विधान सभा चुनाव की ओर मुखातिब हो गई है और किस सीट पर किस दल या निर्दल की जीत का पताका फहरेगा , इस पर मंथन शुरू कर दी है।

लेकिन , जनता की इस तरह की उत्सुकता के बीच में कहीं पर भी भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की उत्सुकता नज़र नहीं आ रही है , तो ना कहीं पर जदयू के नेताओं कार्यकर्ताओं की चुनावी उत्सुकता दिखाई दे रही है।

इस बीच एन डी ए के भाजपा ,जदयू , एल जे पी आर के उम्मीदवारगण अपने अपने निर्वाचन क्षेत्र के मैदान की परिक्रमा करने में लगे हुए हैं , लेकिन , उनके सहयोग और समर्थन के प्रति कहीं जदयू की उदासीनता बनी हुई है तो कहीं भाजपा की , और इस कड़ी की बड़ी खबर यह भी है कि जिस सीट से एल जे पी आर की उम्मीदवारी है , उस सीट के उम्मीदवार ही आश्चर्यजनक रूप से एन डी ए गठबंधन में शामिल दलों के नेताओं कार्यकर्ताओं से बेखबर रहते हुए एकाध भाजपा नेता की चंगुल में फंस कर उक्त भाजपा नेता के इशारे पर ही बिना किसी गवैया और बजनिया के ही चुनाव मैदान में नाचते फिर रहे हैं।

आश्चर्यजनक रूप से पहली बार इस बार के विधान सभा चुनाव के दौरान जो चुनावी तस्वीरें दिखाई दे रही है उसके अनुसार , सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह खड़ा हो गया है कि इस बार के विधान सभा चुनाव के दृश्यों के बीच से सीमांचल क्षेत्र की संपूर्ण चुनावी पटल से जदयू की सक्रियता क्यों गौण हो गई है अर्थात चुनाव के मद्देनजर सीमांचल के बड़े कहे जाने वाले जदयू नेताओं की चुप्पियों से संपूर्ण सीमांचल क्षेत्र इस सवाल से जूझता नजर आ रहा है।

सवाल यह भी तैर रहे हैं कि एल जे पी आर के उम्मीदवार द्वारा एन डी ए गठबंधन में शामिल दलों के नेताओं की उपेक्षा आखिर किसके इशारे पर की जा रही है और सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि भाजपा और जदयू के द्वारा किस किस सीट पर किस किस उम्मीदवार को खुला सहयोग समर्थन प्रदान किए जा रहे हैं।

 

अमूमन ऐसे सवाल ऐन चुनाव के वक्त उठाना लाजिमी नहीं माना जाता है। लेकिन , इस सीमांचल क्षेत्र में जो दृश्य उभर कर सामने आते जा रहे हैं उसके आलोक में उपरोक्त सवालों की छेड़छाड़ को वाजिब माना जा सकता है।

जानकारों द्वारा बताया जा रहा है कि पूर्णिया सदर की विधानसभा सीट पर इस बार भी भाजपा की जीत के आसार हैं और धमदाहा की सीट पर जदयू की जीत के आसार बलबती हैं। लेकिन , बड़ा सवाल यह है कि इस तरह की जीत की कोई ठोस संभावना एन डी ए गठबंधन और उसके नेताओं के द्वारा कसबा की सीट पर क्यों नहीं व्यक्त की जा रही है और किशनगंज की भाजपा वाली सीट को जीत लेने के दावे करने में हिचकिचाहट क्यों महसूसी जा रही है।जबकि इस बार वर्षों बाद किशनगंज सदर विधान सभा क्षेत्र की सीट पर भाजपा की टक्कर में कोई ठोस प्रतिद्वंदी दिखाई नहीं दे रहे हैं।कमोवेश ऐसी ही स्थिति लगभग ठाकुरगंज की विधान सभा क्षेत्र की सीट पर भी उपस्थापित हैं , जहां पर , जदयू के प्रत्याशी की सीधी टक्कर डायरेक्ट राजद वाले महागठबंधन के प्रत्याशी से हैं।

स्पष्ट है कि इस बार के विधान सभा चुनाव में पिछले बार के विधान सभा चुनाव की तुलना में एन डी ए गठबंधन वाली जदयू और भाजपा की स्थिति काफी मजबूत नजर आने के बाबजूद एन डी ए में जीत के प्रति सिर्फ इसलिए हिचकिचाहटें बंधी हुई है क्यों कि इस बार के विधान सभा चुनाव के दौरान किसी अंदरूनी मनमुटावों की वजह से न खुलकर जदयू के नेतागण चुनाव में दिलचस्पी लेते दिखाई दे रहे हैं और न ही भाजपा के नेतागण।

पूर्णिया के पूर्व सांसद संतोष कुशवाहा द्वारा जदयू से इस्तीफा दे दिए जाने के बाद से तो सीमांचल क्षेत्र की एनडीए गठबंधन की राजनीति में जदयू के कुछर कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं की सक्रियता ही लकवाग्रस्त हो गई है।जो इस चुनाव के दौरान अभी तक यथा स्थिति दीख रही है।

सीमांचल क्षेत्र में जदयू के एक बड़े नेता और चुनावी रणनीतिकार राकेश कुमार सीमांचल क्षेत्र के चुनावी वातावरण में सदैव जदयू के जाने माने नेता माने जाते रहे हैं और शायद ही कोई चुनाव होगा जिसमें उनकी रणनीति का इस्तेमाल करके जदयू लाभान्वित नहीं हुआ होगा , लेकिन , घोर आश्चर्य की बात है कि पिछले तमाम लोकसभा और विधान सभा चुनावों की भांति उनकी वैसी कोई सक्रियता किसी को नज़र नहीं आ रही है और जैसी पूर्व के चुनावों में रही थी और यही कारण है कि संपूर्ण सीमांचल में इस बार सबसे बड़ा सवाल यही दोहराया जा रहा है कि आखिर ऐसे तमाम खास खास एनडीए गठबंधन के जदयू नेतागण चुनावी दिलचस्पी से दूरियां क्यों बनाए हुए हैं।

इस संबंध में चर्चा है कि एन डी ए के कुछ उम्मीदवारों को दल के भीतर के ही कुछ नेताओं के द्वारा दिग्भ्रमित कराकर दल के चुनावी रणनीतिकारों से दूरियां बनाने के लिए बाध्य कर दिया गया है और इस कारण उम्मीदवार की पार्टी   से लेकर सम्पूर्ण एन डी ए गठबंधन के नेताओं और चुनावी रणनीतिकारों की चुनावी दिलचस्पी को ग्रहण लगना शुरू हो गया है।जिसे ग्रहणमुक्त कराए बिना इस बार के चुनाव में सीमांचल क्षेत्र से एन डी ए की उपलब्धि दर्ज़ कराना आसान नहीं है।