सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन साहब के दोनों बेटों ने आपसी जंग में उड़ा दी पुश्तैनी राजनीतिक बर्चस्व की धज्जियां

सीमांचल के प्रभावशाली नेता स्व. तस्लीमुद्दीन साहब के राजनीतिक साम्राज्य के पतन की कहानी बयान करता है। छह दशक तक जोकीहाट और सीमांचल क्षेत्र पर उनका और उनके परिवार का मजबूत राजनीतिक वर्चस्व रहा, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद दोनों बेटों—सरफराज आलम और शाहनवाज आलम—की आपसी कलह ने इस पारिवारिक पकड़ को तोड़ दिया। 2018 के उपचुनावों में दोनों बेटों की जीत के बाद उम्मीद थी कि विरासत आगे बढ़ेगी, लेकिन 2019, 2020 और 2024 के चुनावों में पराजयों के सिलसिले ने स्थिति बदल दी। 2025 के विधानसभा चुनाव में दोनों भाई एक ही सीट जोकीहाट से आमने-सामने उतरे, जिससे जनता नाराज हो गई और दोनों को खारिज कर एमआईएम उम्मीदवार को चुना। परिणामस्वरूप लगभग 56 वर्षों में पहली बार तस्लीमुद्दीन परिवार की राजनीतिक पकड़ समाप्त होती दिखाई दी और सवाल खड़ा हुआ कि क्या यह घराना सचमुच 2025 से राजनीतिक रूप से खत्म हो चुका है।

सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन साहब के दोनों बेटों ने आपसी जंग में उड़ा दी पुश्तैनी राजनीतिक बर्चस्व की धज्जियां

सीमांचल (अशोक/विशाल)

सीमांचल के इस बार का विधानसभा चुनाव इसलिए अप्रत्याशित नहीं रहा कि इस सीमांचल क्षेत्र के पूर्णिया से किशनगंज जिले तक में राजद का सफाया हो गया।

बल्कि इसलिए अप्रत्याशित रहा कि अररिया जिले की स्वर्गीय सीमांचल गांधी जनाब तस्लीमुद्दीन साहब वाली जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र की सीट पर इस बार स्वर्गीय सीमांचल गांधी जनाब तस्लीमुद्दीन साहब का फैमिली पॉलिटिकल तिलिस्म हवा हवाई हो गया।

राजनीति के क्षेत्र में कठिन परिश्रम करते हुए जिस सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन ने वर्ष 1959 से 1964 तक अपने पुश्तैनी गांव सिसौना के क्रमशः सरपंच और मुखिया पद की सफल राजनीति को अंजाम देते हुए अपने गृह विधान सभा क्षेत्र जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र की सीट पर वर्ष 1969 से विधायक निर्वाचित होते हुए वर्ष 1985 तक लगातार विधायक पद का चुनाव जीतते हुए 1989 में पहली बार पूर्णिया संसदीय क्षेत्र से सांसद निर्वाचित होने का गौरव प्राप्त किया और उसके बाद 1995 में पुनः जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होने के बाद किशनगंज को अपनी राजनीति का आखेट स्थल बनाते हुए वर्ष 1996 के संसदीय चुनाव में किशनगंज से भी सांसद निर्वाचित होने में कामयाबी हासिल कर तत्कालीन केन्द्र सरकार में सीधे केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री के पद पर सुशोभित हुए और फिर 1998 के संसदीय चुनाव को भी जीतकर किशनगंज से दोबारा सांसद निर्वाचित हुए और उसके बाद हुए वर्ष 2000 के किशनगंज विधानसभा चुनाव को भी जीत कर किशनगंज सदर विधान सभा क्षेत्र की सीट से भी विधायक बनने का कीर्तिमान स्थापित कर तत्कालीन बिहार सरकार में भवन निर्माण मंत्री पद हासिल किया और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ होने के कारण उस दौरान बुढ़वा के नाम से ख्यात हो वर्ष 2004 में भी किशनगंज से सांसद निर्वाचित होकर तत्कालीन केन्द्र सरकार में केंद्रीय उपभोक्ता मामले और खाद्य राज्य मंत्री के पद पर आसीन हुए उस तस्लीमुद्दीन के बारे में कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अपनी जिंदगी में स्वर्गीय सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन साहब ने अपनी मर्ज़ी के अनुसार अपनी जहां से भी चाहे वहां से चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनाया।

लेकिन , जब सुरजापुरी मुस्लिम बिरादरी से किशनगंज संसदीय क्षेत्र में उभरे एक नेता मौलाना असरारूल हक क़ासमी ने  घरेर छुआ वोट दुम  का नारा बुलन्द करके किशनगंज जिले की बहुसंख्यक सुरजापुरी मुस्लिम बिरादरी को गोलबंद कर अपने पाले में एकजुट कर लिया और तस्लीमुद्दीन से किशनगंज संसदीय क्षेत्र की सीट को तस्लीमुद्दीन से चुनाव जीत कर किशनगंज की सीट को छीन कर किशनगंज से कांग्रेस सांसद के रूप में स्थापित हो गए तो तस्लीमुद्दीन को अपना मूल क्षेत्र अररिया वापिस लौटना पड़ गया।

लिहाजा , सीमांचल गांधी के नाम से ख्यात कद्दावर राजनेता तस्लीमुद्दीन वर्ष 2014 में अररिया से संसदीय चुनाव जीतकर अररिया के सांसद बन गए।

लेकिन , महज़ तीन वर्ष वहां पर अपनी सेवाएं जनता को प्रदान करते हुए 2017 में बीमारी से ग्रसित होकर अपनी सांसें त्याग दिए।

और तब उनकी जिम्मेदारी को जनता के बीच निभाने के लिए उनके दोनों बेटे सरफराज आलम और शाहनवाज आलम पर भार पड़ा।

जिस वजह से वर्ष 2018 में अररिया संसदीय क्षेत्र में हुए संसदीय उप चुनाव में स्वर्गीय सीमांचल गांधी जनाब तस्लीमुद्दीन साहब के राजनीति क्षेत्र के बड़े पुत्र और जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र के तत्कालीन विधायक सरफराज आलम  अररिया से सांसद निर्वाचित हो गए।

और रिक्त हुए जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र की सीट पर हुए उप चुनाव में सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे शाहनवाज आलम अपनी माता के आशीर्वाद से उपचुनाव जीतकर जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हो गए।

लेकिन , वर्ष 2019 के लोकसभा आम चुनाव में अररिया संसदीय क्षेत्र की सीट पर काबिज़ तस्लीमुद्दीन के बड़े पुत्र सरफराज आलम चुनाव हार गए और उधर 2020 के विधान सभा आम चुनाव की दस्तक पड़ते ही तस्लीमुद्दीन साहब के सिटिंग जोकीहाट विधायक बेटे शाहनवाज आलम ने जब चुनाव मैदान में कूदने की तैयारी शुरू कर दी तो छोटे भाई शाहनवाज की तैयारी के बीच दीवार के रूप में आ खड़े हुए अररिया के पूर्व सांसद सह तस्लीमुद्दीन साहब के बड़े राजनीतिक पुत्र सरफराज आलम ने स्वयं ही जोकीहाट की विधान सभा क्षेत्र की सीट से चुनाव में कूदने की छटपटाहट शुरू कर दी।

वर्ष 2019 के संसदीय आम चुनाव में अपनी पराजय से बौखलाए पूर्व सांसद सरफराज आलम ने वर्ष 2020 के विधान सभा चुनाव को स्वयं लड़ने के लिए छोटे भाई शाहनवाज आलम पर चुनाव और राजनीति से अलग हो जाने के लिए भारी दबाव बनाया , काफी हो हंगामा किया कि जिसकी वजह से इनकी सारी खबरें मीडिया में सुर्खियां बटोरने लगी । उधर , बतौर सिटिंग विधायक तस्लीमुद्दीन साहब के छोटे बेटे शाहनवाज आलम भी अपनी माता की आज्ञा से चुनाव मैदान में डटे रहने की ज़िद्द पर अड़े रहे।

उधर , जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र की सीट से राजद की चुनावी टिकट सरफराज आलम ने अपने लिए कन्फर्म करा लिया।

 लिहाजा , छोटे भाई शाहनवाज आलम भी पीछे नहीं हटे और एम आई एम की टिकट पर चुनाव लड़ चुनाव जीत लिए। लेकिन , जब 2024 के अररिया संसदीय क्षेत्र के आम चुनाव के दौरान सरफराज आलम राजद द्वारा बेटिकट कर दिए गए और राजद द्वारा जोकीहाट के तत्कालीन सिटिंग विधायक शाहनवाज आलम को ही अररिया संसदीय क्षेत्र का चुनाव लड़ाया गया तो दोनों भाइयों की किच किच में शाहनवाज आलम भी अररिया संसदीय क्षेत्र का चुनाव हार बैठे।

जबकि पूरे 5 वर्ष की राजनीतिक बेरोज़गारी झेले बड़े भाई सफ़राज आलम जोकीहाट से 2025 का विधान सभा चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए।

2025 के विधान सभा चुनाव में जोकीहाट से सिटिंग विधायक शाहनवाज आलम ही राजद से चुनाव लड़े तो उनके पूर्व सांसद बड़े भाई सफ़राज आलम प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज से जुड़कर जन सुराज पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े।

लेकिन , वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में स्वर्गीय सीमांचल गांधी जनाब तस्लीमुद्दीन साहब के इन दोनों बेटों की एक साथ करारी हार हो गई और एमआईएम के उम्मीदवार मुर्शीद आलम ने जोकीहाट की सीट पर बाज़ी मार ली।

बताया जाता है कि एक ही विधानसभा क्षेत्र जोकीहाट से दोनों भाइयों की चुनावी लड़ाई से ऊबकर ही जोकीहाट की जनता ने दोनों भाइयों को जोकीहाट की राजनीतिक फ़ील्ड से बाहर निकाल दिया और इस तरह वर्षों बाद तस्लीमुद्दीन घराने से अलग के नए प्रतिनिधि का चयन जनता ने किया और स्वर्गीय सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन के पारिवारिक राजनीतिक तिलिस्म को उखाड़ कर फेंक दिया। अब स्वर्गीय सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन साहब के दोनों ही बेटे हार को गले लगा बेरोजगारी झेलने को मजबूर हो गए हैं।

हल्ला मच गया कि इस बार के विधान सभा आम चुनाव 2025 में पहली बार यानि लगभग 56 वर्षों के बाद सिसौना गांव के पॉलिटिकल फैमिली का वर्चस्व जोकीहाट विधान सभा क्षेत्र में धूल धूसरित हुआ है और उसकी वजह पोलीटिकल नहीं वल्कि दोनों भाइयों के बीच होने वाले चुनावी जंग रहे।

सीमांचल की राजनीति में कद्दावर और प्रतापी नेता के रूप में 56 वर्ष तक लगातार अपना और अपने परिवार का वर्चस्व बनाए रखने वाले मरहूम तस्लीमुद्दीन साहब की मृत आत्मा इस घटना से फिलवक्त क्षत विक्षत हो रही होगी कि उनके दोनों बेटों ने क्षेत्र में अपने अलग अलग बर्चस्व स्थापित करने की कोशिश में आपसी संबंध और एकजुटता को इस तरह पैरों तले रौंद डाला कि मरहूम सीमांचल गांधी तस्लीमुद्दीन साहब के सारे किए कराए पर पानी फिर गया।

सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अब फ़िर से लौटकर तस्लीमुद्दीन साहब का फैमिली पॉलिटिकल तिलिस्म क्षेत्र में स्थापित हो सकेगा , अथवा , 2025 की चुनावी गाथाओं ने अंतिम रूप से नई राजनीतिक गाथायें लिखते हुए बता दिया कि बीस सौ पच्चीस : तस्लीमुद्दीन घराना फिनिश।